יום שישי, 30 בינואר 2009
फिजा और चाँद
फिजा और चाँद का किस्सा बड़ी खबर है। लेकिन समझ नही आ रहा है की समाज कहाँ जा रहा है। पत्रकरों के भी अपने तर्क हैं। जबरन मेहमान बन्ने की आदत है।नौकरी करनी है तौ कुछ भी करना होगा। फिजा जैसे किरदार तौ हर गली मे जाएँगी। चंद्रमोहन जैसे लोग हर जगह कुत्तागीरी करते दिख जायेंगे। पत्रकरों को अपनी आबरू ख़ुद ही dekhnee है॥
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